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सत्येन्द्र कुमार तिवारी उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने भारत को दो भिन्न युगों में जिया है- एक वह समय जब गाँव की सुबहें सादगी से भरी होती थीं, लालटेन की रोशनी में पढ़ाई होती थी, और रिश्तों की डोर चिट्ठियों से जुड़ी रहती थी;
और दूसरा वह समय, जब 1991 के बाद उदारीकरण ने देश के द्वार खोले- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आईं, निजीकरण बढ़ा, डिजिटल क्रांति ने जीवन की गति बदल दी, और समाज ने अभूतपूर्व परिवर्तन देखे। इन दोनों संसारों के मध्य खड़े होकर सत्येन्द्र कुमार तिवारी ने बदलाव को केवल देखा ही नहीं- उसे महसूस किया, जिया और गहराई से समझा है। वे स्वयं को किसी एक जनरेशन की परिभाषा में सीमित नहीं मानते। उनका विश्वास है कि मनुष्य की पहचान उसके जन्मवर्ष से नहीं, बल्कि उसके संघर्ष, अनुभव और मूल्यों से निर्मित होती है।
उनकी दृष्टि में समय केवल बीतता नहीं- वह मनुष्य के भीतर से होकर गुजरता है और उसके विचारों, संवेदनाओं तथा व्यक्तित्व को आकार देता है।
लालटेन से लैपटॉप तक
उनकी व्यक्तिगत यात्रा के साथ-साथ उस पीढ़ी की सामूहिक स्मृति का दस्तावेज़ है, जिसने सीमित संसाधनों से असीम संभावनाओं तक का साहसिक सफ़र तय किया।
सत्येन्द्र कुमार तिवारी
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